लेखक: प्रतिष्ठा श्रोत्रिय ख़ान और मुश्फ़िक ख़ान

इससे पहले मानव जाति ने कभी भी आज के इस परिवेश का न तो अनुभव किया था और न ही दूर-दूर तक इसकी कल्पना की थी। न ही हमारे इतिहास में लड़े गए युद्धों की कहानी, न ही उन दंगों के ज़िक़्र जिससे होकर हमारी ज़िंदगी गुज़री और न ही किसीतबाही की काल्पनिक कथा ने हमें उस हालात के लिए तैयार किया जो आज हमारे सामने है। निराशा और आशाहीनता की गहरी खाई में गिरना आसान, यहां तक कि सामान्य सी बात है।

हम दोनों शब्दों, किताबों और कविताओं के प्रेमी हैं; हमने ख़ुद को उन ढेर सारी किताबों के पन्नों में लॉकडाउन कर लिया है, जहां हमें तसल्ली और संतुष्टि मिलती है। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ (1911-1984) की एक कविता हक़ीक़त में हमसे बातें करती है।

फ़ैज़ अपनी इस कविता की शुरुआत में मानव जीवन की नाउम्मीदी और ख़ालीपन पर ज़ोर देते हैं। फ़ैज़ का मक़सद सिर्फ़ यह याद दिलाना है कि समय कितना ही अंधकारमय क्यों न लगे, मानव जीवन को किसी संकट, आपदा या जानलेवा वायरस की भेंट चढ़ने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता है। ज़िंदगी इससे बहुत बड़ी और क़ीमती है।

हमने लॉकडाउन के दायरे में रहकर ज़्यादातर वीडियो अपने मोबाइल फ़ोन पर शूट किए हैं। हमारे मित्रों और सहयोगियों ने अपने बेशक़ीमती कौशल से इस प्रोजेक्ट को उन्नत बनाने में अपना योगदान दिया है- एक ताक़ीद (रिमाइंडर) है कि ज़िंदगी, प्यार और दोस्ती सभी त्रासदियों से ऊपर है। और इसी में हमारी पीढ़ी की सच्ची जीत छुपी हुई है।