कोविड-19 के विरुद्ध लड़ाई में 25 मार्च से चल रहे लॉक डाउन को अब 17 मई तक बढ़ा दिया गया है। बेशक,‌अगले दो हफ्तों के लिए बढ़ाए गए इस लॉक डाउन में कई तरह की छूटें भी शामिल हैं। कह सकते हैं कि यह देश को पटरी पर लाने की प्रक्रिया की शुरुआत है।

लेकिन इस पूरे लॉक डाउन के बीच हमारे सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन को लेकर कई महत्वपूर्ण प्रश्न भी सामने आए जिनसे मुठभेड़ करते हुए हम यह भी समझ सकते हैं कि कोविड-19 के खिलाफ हमारी लड़ाई में कहां-कहां कमजोरियां हैं और हम कैसे उन से पार पा सकते हैं। पहला प्रश्न तो यही है कि क्या हमने लॉक डाउन का क़ायदे से पालन किया?

प्रधानमंत्री की पहली घोषणा के बाद दो दृश्य दिखे। पूरा का पूरा खाता-पीता समाज दुकानों पर टूट पड़ा- उसे फिक्र हो गई कि अगर लॉक डाउन लंबा खिंचा तो उसका राशन कम न पड़ जाए। हालांकि सरकार ने बहुत स्पष्ट आश्वासन दिया था कि खाने-पीने के सामान की कोई किल्लत नहीं होने दी जाएगी।दूसरा दृश्य अगले दिन सड़कों पर दिखा जब दिल्ली और देश के कई दूसरे शहरों में मज़दूर बस और ट्रेन पकड़ने के लिए दौड़ पड़े। दिल्ली के आनंद विहार रेलवे स्टेशन के पास जो भीड़ उमड़ी, उसे देखकर सब हैरान हो गए कि यह लोग क्या वाकई दिल्ली में ही रहते थे?

जाहिर है, लॉक डाउन में बताया कि हम एक बंटे हुए समाज हैं जो एक दूसरे को ठीक से नहीं पहचानते हैं, एक दूसरे पर कम भरोसा करते हैं और एक दूसरे की मदद के लिए कम खड़े होते हैं। यह बात सुनने में कुछ तीखी लगती है लेकिन इसके प्रमाण लॉक डाउन के आने वाले दिनों में ही सामने आ गए। जिन लोगों ने प्रधानमंत्री के आह्वान पर ताली-थाली बजाई थी और कोरोनावायरस के खिलाफ जंग में एकजुटता का संकल्प दिखाया था, वही लोग उन डॉक्टरों और नर्सों को घर से निकालने पर तुले थे जो कोविड-19 अस्पतालों में काम कर रहे थे। कोविड-19 के संदिग्धों और मरीजों के साथ इससे कहीं ज्यादा बुरा सलूक हो रहा था। लोग अपने इलाकों में क्वॉरन्टीन सेंटर नहीं बनने दे रहे थे कि कहीं कोरोना वायरस उनके घरों तक न पहुंच जाए। महामारियों के बारे में अक्सर कहते हैं कि उनको किसी धर्म किसी क्षेत्र और किसी पहचान से नहीं जोड़ा जाना चाहिए क्योंकि वायरस यह सब नहीं देखते। लेकिन हमने यह काम भी किया। कोरोना वायरस को एक सांप्रदायिक पहचान से जोड़ने की कोशिश की।

यह गंभीर संकट है। किसी महामारी का इलाज सिर्फ टीकों और दवाओं से नहीं होता, उससे‌ समाज की सामूहिकता और साझा विवेक से भी लड़ना पडता है। कहने की जरूरत नहीं कि लड़ाई के इस मोर्चे पर हम कमजोर साबित हुए हैं। विदेशों से आए लोग अपनी बीमारियां छुपाते रहे, धार्मिक संगठन अपने कार्यक्रम करते रहे, तीर्थयात्राएं जारी रहीं, नेताओं के घर शादियां होती रहीं, राजनीतिक कार्यक्रमों में सामाजिक दूरी के नियम टूटते रहे, बड़े बड़े अफसर अपने बच्चों को क्वॉरन्टीन किए जाने से बचाने के लिए अपनी ताकत का इस्तेमाल करते रहे और इन सबकी वजह से भी कोरोनावायरस के विरुद्ध हमारी लड़ाई कमजोर पड़ती रही।

अब जब लॉक डाउन बढ़ाए जाने के साथ कई छूटें भी बढ़ाई जा रही हैं तब इस बात पर और ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है कि यह लड़ाई सामूहिक विवेक से भी लड़ी जाएगी। इस बात को भी पहचानना होगा कि हमने जाने-अनजाने दो भारत बना दिए हैं जो अलग-अलग टापू नहीं हैं। अगर आज देश को हम एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में विकसित करने का सपना देखते हैं तो इसमें बहुत बड़ी भूमिका उन मज़दूरों और गरीबों के अदृश्य श्रम की भी है जो बहुत कम साधनों में हमारे सबसे जरूरी काम निपटाते हैं। तो इस फासले को हम जितना कम करेंगे, उतने ही समृद्ध और सुरक्षित होंगे।

आखिरी बात- किसी बड़े संकट में ही सभ्यता की असली परीक्षा होती है। यह हम सबके लिए इम्तिहान की घड़ी है। हमें यह भी पहचानना होगा कि कोरोनावायरस के अलावा हमने सामाजिक भेदभाव और नफरत के जो वायरस अपनी कोशिकाओं में दाखिल होने दिए हैं, वे कम खतरनाक नहीं है। कोरोनावायरस से लड़ना जितना ज़रूरी है उतना ही ऐसे वायरसों से भी। कोरोनावायरस की महामारी से बच जाने के बाद भी अगर एक मनुष्य के रूप में हम नहीं बदल पाते हैं तो इस तरह बचे रहने का भी कोई ज़्यादा अर्थ नहीं है। उम्मीद करें कि हम बचेंगे भी और बदलेंगे भी।