अभी विकट महामारी का दौर चल रहा है। पूरी दुनिया में तबाही का मंजर है । बीते दो महीनों (मार्च-अप्रैल 2020) में इस बीमारी ने पूरे संसार को अपने चंगुल में ले लिया है। दुनिया की रफ्तार थम सी गई है। हर जगह की गलियां,सड़कें, हाईवे सन्नाटे में डूब चुकी हैं। रोशनी से जगमगाती दुकानें, चौराहे ,स्ट्रीट सुने हो चुके हैं। कहीं सरकारी आदेश से तो कहीं मौत के डर से लॉकडाउन है। लोग घरों में कैद हो चुके हैं। बंद हो गई है सामान्य दिनचर्या। बंद हो गया है सारा कारोबार, यातायात, स्कूल -कॉलेज, फैक्ट्रियां। बंद सब कुछ बंद। बस खुले हैं अस्पताल और जरूरी सेवाएं।

हमारे देश में अभी लॉक डाउन का तीसरा दौर चल रहा है हम सभी सरकारी फरमान को मानते हुए अपने घरों में सिमटे हुए हैं ।जाहिर है हम सभी साधन संपन्न हैं। जरूरी सामान के लिए सरकार ने दुकान खोलने की छूट दे रखी है, जरूरत होगी तो यह तबका कुछ एहतियात के साथ सामान अपने घरों में ले आएगा। लॉकडाउन को हम पूरी संजीदगी से निभा रहे हैं।

पर यह क्या कुछ लोग है जो नाफरमानी कर रहे हैं! अपने पीठ या कंधों पर छोटे- बड़े झोले लटकाए लगातार सड़कों पर चले जा रहे हैं मीलों लंबे सफर में। जहां सन्नाटे में डूबी सड़कों में सिर्फ एंबुलेंस और पुलिस की गाड़ियां दौड़ रही है वहां यह लोग पैदल या साइकिल पर चले जा रहे हैं।यह मजदूर वर्ग है जो काम के सिलसिले मेंअपने घरों से मीलों दूर दूसरे राज्य में आए हैं। लॉकडाउन की वजह से उनके पास खाने -कमाने का कोई जरिया नहीं बचा।

दरअसल , यह वही वर्ग है जिनकी मार्फत हमें शहरी जीवन की सुविधाएं और ऐशो-आराम मसलन,इमारतें ,सड़कें, मेट्रो, साफ सफाई आदि सुलभ है। लेकिन हम सुविधा भोगी वर्ग की सोच  में यह मजदूर तबका अदृश्य है इसी सोच की यह परिणिती रही कि लॉकडाउन के सरकारी फरमान जारी करते वक्त भी इस तबके की दिक्कत ध्यान में नहीं रहे ।

कोरोनाकाल के आंकड़ों के बीच कुछ मीडिया ने इनकी हालात का जायजा लिया तो आनन-फानन में सरकार ने कई पैकेज घोषित किए पर यह पैकेज भी रजिस्टर्ड मजदूरों के हिस्से ही रहे  चूंकि मजदूरों का एक बड़ा हिस्सा सरकारी रजिस्टर से गायब है तो राहत की पहुंच से भी दूर है।ऐसे अदृश्य या गायब लोगों का सहारा बनी है कई संस्थाएं, या कई व्यक्तिगत प्रयास । इनकी मदद से इन लाचार लोगों को भोजन और अन्य राहत सामग्री मिल रही है । आपदा के इस वक्त में कई एनजीओ और व्यक्तिगत मदद ने मिसाल कायम की है।

महामारी के इस दौर में सरकारी निर्देश का पालन करते हुए कई एनजीओ लगातार वंचित लोगों की मदद कर रहे हैं। ऐसी संस्थाएं अपने साधन के हिसाब से अपना काम लगातार कर रही हैं। इन संस्थाओं ने इसे जारी रखने के लिए लोगों से मदद की अपील की है। कई लोग मदद के लिए आगे आ रहे हैं यानी ऐसी सस्थाएं सुविधा संपन्न वर्ग और मजदूर वर्ग के बीच सेतु का काम कर रही है। बहरहाल,  व्यक्तिगत प्रयास हो या संस्थागत प्रयास, राहत के उपाय हाशिए के इन वर्गों के लिए हमेशा जीवनदायिनी रहा है। अन्य देशों की तरह हमारे देश में भी  ऐसी संस्थाएं चुपचाप अपना काम करती रही हैं।

सामान्य दौर में भी यह संस्थाएं बेजुबान लोगों की आवाज बनीं। बेसहारा की सहारा बनीं। दरअसल, इन संस्थाओं का चुपचाप प्रयास पीढ़ियों के डिस्टेंसिंग को मिटाने का प्रयास है जो कल भी रहा है और आज भी है ।इन गुमनाम योद्धाओं को सलाम!